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सरकारी कर्मचारियों के लिए एक बड़ी राहत में, मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि पेंशन एक मौलिक अधिकार है और यह सरकार द्वारा दी जाने वाली कोई "खैरात" या "दान" नहीं है। 25 मार्च, 2026 को अदालत ने आदेश दिया कि किसी भी कर्मचारी की पेंशन को तब तक रोका या कम नहीं किया जा सकता जब तक कि कानून की उचित प्रक्रिया का पालन न किया जाए।
फैसले के मुख्य बिंदु: अदालत एक सेवानिवृत्त राज्य कर्मचारी की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसकी पेंशन "प्रशासनिक देरी" और एक लंबित विभागीय जांच के कारण तीन साल से रोक दी गई थी।
संपत्ति का अधिकार: अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 300A का हवाला देते हुए कहा कि पेंशन कर्मचारी की "संपत्ति" है। बिना किसी कानूनी आधार के किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से वंचित करना असंवैधानिक है।
विलंबित वेतन (Deferred Wages): मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनक ने जोर देकर कहा कि पेंशन वास्तव में कर्मचारी द्वारा की गई वर्षों की सेवा का "विलंबित वेतन" है। यह बुढ़ापे में गरिमा के साथ जीने के लिए एक सामाजिक सुरक्षा उपाय है।
कटौती पर रोक: पीठ ने स्पष्ट किया कि एक बार पेंशन निर्धारित हो जाने के बाद, "लिपिकीय त्रुटियों" या "संशोधित गणना" के बहाने कर्मचारी को सुने बिना उसे मनमाने ढंग से कम नहीं किया जा सकता।
बिना ठोस कारण रोक नहीं: केवल "जांच की संभावना" के आधार पर पेंशन नहीं रोकी जा सकती। केवल गंभीर कदाचार के लिए लंबित न्यायिक कार्यवाही ही इसे सीमित कर सकती है।
देरी पर ब्याज: अदालत ने आदेश दिया कि यदि बिना किसी वैध कानूनी कारण के पेंशन में देरी होती है, तो सरकार को देय तिथि से 8% वार्षिक ब्याज देना होगा।
अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा: फैसले में कहा गया कि पेंशन प्राप्त करने का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार से जुड़ा है, क्योंकि यह वरिष्ठ नागरिकों की आजीविका का मुख्य साधन है।
स्रोत / संदर्भ: झारखंड उच्च न्यायालय (न्यायिक शाखा) 2026 रिपोर्ट के आधार पर।
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