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"शराब घोटाले" की कानूनी लड़ाई 2026 में अपने सबसे निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। पिछले महीने एक विशेष अदालत द्वारा पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया को भ्रष्टाचार के सभी आरोपों से मुक्त किए जाने के बाद, CBI ने दिल्ली हाई कोर्ट में 974 पन्नों की एक विशाल कानूनी चुनौती पेश की है।
निचली अदालत का केस: CBI बनाम कुलदीप सिंह एवं अन्य (CBI Case No. 56/2022), राउज एवेन्यू कोर्ट।
हाई कोर्ट की अपील: CBI बनाम अरविंद केजरीवाल एवं अन्य (CRL.REV.P. 182/2026)।
महत्वपूर्ण तिथि: हाई कोर्ट में इस मामले की सुनवाई 9 मार्च, 2026 को जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की बेंच के सामने होगी।
पिछला फैसला: रिहाई का आदेश 27 फरवरी, 2026 को विशेष न्यायाधीश जितेंद्र सिंह द्वारा पारित किया गया था। न्यायाधीश जितेंद्र सिंह ने सभी 23 आरोपियों को बरी कर दिया था। जज ने कहा कि CBI किसी भी आपराधिक साजिश का "प्रथम दृष्टया" (Prima facie) सबूत पेश करने में विफल रही। कोर्ट ने जांच को "पूर्व-नियोजित और कोरियोग्राफ्ड" करार देते हुए मुख्य जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच की सिफारिश भी की थी।
अपने 598 पन्नों के फैसले में, जज जितेंद्र सिंह ने कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने फैसला सुनाया कि CBI का मामला ठोस सबूतों के बजाय "अटकलों और अनुमानों" पर आधारित था। कोर्ट को आपराधिक साजिश का कोई "प्रथम दृष्टया" प्रमाण नहीं मिला और टिप्पणी की कि जांच "पूर्व-नियोजित और कोरियोग्राफ्ड" प्रतीत होती है, जिसका उद्देश्य बिना पुख्ता तथ्यों के आरोपियों को फंसाना था।
CBI की रिवीज़न याचिका में जज के आदेश को "स्पष्ट रूप से अवैध" बताया गया है। एजेंसी का तर्क है कि जज ने आरोप तय करने के चरण में ही "मिनी-ट्रायल" (छोटा मुकदमा) चला दिया, जिसकी कानूनन अनुमति नहीं है। उनका दावा है कि कोर्ट ने उन "पुख्ता सबूतों" को नजरअंदाज किया जो दिखाते हैं कि करीब ₹100 करोड़ की रिश्वत के बदले नीति में बदलाव किए गए थे।
9 मार्च को हाई कोर्ट तय करेगा कि रिहाई के आदेश पर रोक लगाई जाए या उसे बरकरार रखा जाए। यदि हाई कोर्ट CBI की याचिका स्वीकार कर लेता है, तो मुकदमा फिर से शुरू हो जाएगा। इस बीच, प्रवर्तन निदेशालय (ED) का मनी लॉन्ड्रिंग केस (ECIR/HIU-II/14/2022) एक अलग कानूनी बाधा बना हुआ है, हालांकि CBI की इस हार ने AAP नेतृत्व के खिलाफ मामले को कमजोर कर दिया है।
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