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जम्मू-कश्मीर में सरकार द्वारा 25 किताबों को स्कूलों और सार्वजनिक पुस्तकालयों से हटाने के आदेश के बाद एक नया विवाद खड़ा हो गया है। अधिकारियों का कहना है कि इन किताबों के कुछ हिस्सों में "आपत्तिजनक" सामग्री पाई गई, जिसके चलते कार्यवाही करना ज़रूरी था।
बैन की गई किताबों की पूरी सूची अभी सार्वजनिक नहीं की गई है, लेकिन इसमें भारतीय और विदेशी दोनों तरह के लेखक शामिल है । इन किताबों में धर्म, राजनीति और इतिहास से जुड़े ऐसे विचार हैं जिन्हें प्रशासन शांति भंग करने वाला और राष्ट्रविरोधी मानता है। इस सूची में अरुंधति रॉय की कुछ किताबें भी शामिल हैं।
यह आदेश केवल सरकारी संस्थानों पर ही नहीं, बल्कि निजी स्कूलों और सार्वजनिक पुस्तकालयों पर भी लागू है। कई जगहों पर शिक्षक और पुस्तकालयाध्यक्ष इन किताबों को पहले ही हटा चुके हैं, जबकि कुछ स्थानों पर किताबों को हटाने की प्रक्रिया जारी है।
लोगों की सोच इस फैसले पर बंटी हुई हैं। कुछ अभिभावक और शिक्षक इसे सही कदम मानते हैं। उनका कहना है कि बच्चों को ऐसे विचारों वाली किताबों से दूर रखना जरूरी है जो उनकी सोच को गलत दिशा में ले जा सकती हैं या अधूरी जानकारी दे सकती हैं। वहीं, कुछ लोग इसे विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा प्रहार मानते हैं।
एक सेवानिवृत्त स्कूल प्राचार्य ने कहा, “आप सिर्फ इसलिए हर खिड़की बंद नहीं कर सकते कि कहीं से धूल अंदर न आ जाए।” वहीं, एक युवा शिक्षक का कहना था, “अगर धूल हानिकारक है तो खिड़की बंद करना ही समझदारी है।”
भारत में किताबों पर बैन कोई नई बात नहीं है। वर्षों से अलग-अलग राज्यों ने ‘जनहित’, ‘नैतिकता’ या ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ का हवाला देकर कई किताबों पर रोक लगाया है । हालांकि, ऐसे बैन अक्सर लोगों की जिज्ञासा बढ़ा देते हैं और किताबों का अनौपचारिक प्रसार शुरू हो जाता है।
फिलहाल, जम्मू-कश्मीर प्रशासन अपने रुख पर अचल है। उनका कहना है कि यह कदम छात्रों के मानसिक और नैतिक विकास की सुरक्षा के लिए उठाया गया है। इसे ‘संरक्षण’ माना जाए या ‘सेंसरशिप’ यह बहस फिलहाल खत्म होती नहीं दिख रही।