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नागरिक स्वतंत्रता के लिए एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए, ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026, 12 मार्च, 2026 को संसद में पेश किया गया। यह विधेयक 2019 के अधिनियम से जुड़ी लंबे समय से चली आ रही शिकायतों को दूर करने का प्रयास करता है, विशेष रूप से लिंग पहचान की विवादास्पद प्रक्रिया और आरक्षण की कमी पर ध्यान केंद्रित करता है।
2026 विधेयक में प्रस्तावित मुख्य सुधार:
लिंग की स्व-पहचान (Self-ID): सबसे महत्वपूर्ण बदलाव जिला मजिस्ट्रेट (DM) द्वारा चिकित्सा साक्ष्यों के आधार पर लिंग प्रमाणित करने की आवश्यकता को समाप्त करना है। नाल्सा बनाम भारत संघ (2014) के फैसले के अनुरूप, यह विधेयक "स्व-पहचान" तंत्र स्थापित करता है।
क्षैतिज आरक्षण (Horizontal Reservation): न्यायिक दबाव के बाद, विधेयक में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए सार्वजनिक शिक्षा और रोजगार में क्षैतिज आरक्षण का प्रस्ताव है।
विस्तृत परिभाषा: "ट्रांसजेंडर" की परिभाषा को व्यापक बनाया गया है ताकि इसमें नॉन-बाइनरी, जेंडरक्वीर और इंटरसेक्स भिन्नता वाले व्यक्तियों को स्पष्ट रूप से शामिल किया जा सके।
अनिवार्य स्वास्थ्य सेवा: विधेयक में प्रावधान है कि प्रत्येक राज्य सरकार राज्य संचालित अस्पतालों में हार्मोन थेरेपी और लिंग पुनर्निर्धारण सर्जरी (SRS) सहित विशेषज्ञ स्वास्थ्य सेवाएँ निःशुल्क प्रदान करेगी।
2019 के अधिनियम की कार्यकर्ताओं द्वारा कड़ी आलोचना की गई थी क्योंकि इसमें लिंग परिवर्तन के लिए चिकित्सा प्रमाण की आवश्यकता थी। 2026 का संशोधन राज्य के बजाय व्यक्ति को प्राथमिकता देता है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा के अधिकार का सम्मान करता है।
मार्च 2026 के अंत तक, विधेयक को LGBTQIA+ समुदाय के साथ व्यापक परामर्श के लिए एक स्थायी समिति के पास भेजा गया है। वकालत समूहों ने विधेयक का स्वागत किया है, लेकिन वे निजी क्षेत्रों में भेदभाव के खिलाफ सख्त सजा की मांग कर रहे हैं।
सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की अधिसूचना (मार्च 2026) और संसदीय स्थायी समिति के ब्रीफ पर आधारित।
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