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बिहार के मधुबनी जिले के केंद्र में स्थित बलिराजगढ़ की विशाल प्राचीरें आखिरकार अपने सबसे पुराने रहस्य उगल रही हैं। मार्च 2026 तक, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) उस महत्वपूर्ण परत तक पहुँच गया है—लौह युगीन परतें—जो बताती हैं कि यह किलेबंद शहर मौर्य साम्राज्य के उदय से बहुत पहले एक प्रमुख शक्ति केंद्र था।
लगभग 175 एकड़ में फैला बलिराजगढ़ स्थानीय लोककथाओं में राजा बलि से जुड़ा रहा है। हालाँकि, 2026 का उत्खनन सत्र एक अधिक सटीक और ऐतिहासिक विवरण प्रदान कर रहा है।
बलिराजगढ़ की सबसे खास विशेषता इसकी विशाल घेराबंदी वाली दीवार है।
पैमाना: दीवारें लगभग 5 मीटर मोटी हैं। शुरुआत में ये मिट्टी से बनी थीं, जिन्हें बाद में शुंग काल के दौरान पक्की ईंटों से मजबूत किया गया था।
2026 की खोज: पुरातत्वविदों को मिट्टी की प्राचीर के नीचे लकड़ी के घेरे (Palisade) के प्रमाण मिले हैं, जो गंगा बेसिन में पाए जाने वाले लौह युगीन रक्षात्मक ढांचों की विशेषता है।
नार्दर्न ब्लैक पॉलिश्ड वेयर (NBPW) की उच्च सांद्रता पुष्टि करती है कि बलिराजगढ़ एक विशिष्ट शहरी केंद्र था।
खोज: मिट्टी के बर्तनों के अलावा, 2026 की खुदाई में टेराकोटा की मूर्तियाँ, अर्ध-कीमती पत्थरों के मनके और भाले व कीलों सहित लोहे के उपकरण मिले हैं।
आर्थिक संबंध: मनकों की विविधता बताती है कि यह "लौह युगीन साम्राज्य" हिमालय की तलहटी को मगध से जोड़ने वाले व्यापार नेटवर्क का एक केंद्र था।
उत्खनन से पता चलता है कि यहाँ कई शताब्दियों तक निरंतर आबादी रही है।
| काल | अनुमानित तिथियां | बलिराजगढ़ में मुख्य निष्कर्ष |
| लौह युग | 1000 ई.पू. – 600 ई.पू. | प्रारंभिक किलेबंदी, धूसर मृदभांड, लोहे के औजार |
| NBPW चरण | 600 ई.पू. – 200 ई.पू. | उत्कृष्ट मिट्टी के बर्तन, आहत सिक्के, शहरी नियोजन |
| शुंग/कुषाण | 200 ई.पू. – 300 ईस्वी | पक्की ईंटों की संरचनाएं, विस्तृत टेराकोटा कला |
ये निष्कर्ष विदेह (मिथिला) साम्राज्य को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं, जो प्राचीन ग्रंथों में वर्णित प्रमुख जनपदों में से एक था। बलिराजगढ़ उस उन्नत इंजीनियरिंग और सामाजिक व्यवस्था का भौतिक प्रमाण प्रदान करता है जिसने लगभग 3,000 साल पहले इस क्षेत्र पर शासन किया था।
स्रोत / संदर्भ: ASI पटना सर्कल फील्ड रिपोर्ट्स (मार्च 2026) और बिहार राज्य पुरातत्व निदेशालय के आंकड़ों पर आधारित।
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