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यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) ने हाल ही में नए नियम जारी किए हैं जिन्हें इक्विटी रेगुलेशन 2026 कहा जाता है। इनका उद्देश्य जाति, लिंग या विकलांगता जैसी चीजों के आधार पर होने वाले भेदभाव को रोकना है। हालांकि, इन नियमों को लेकर देश भर में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं क्योंकि लोगों के अलग-अलग विचार हैं कि ये नियम कितने सही हैं।
अब भारत के हर कॉलेज और यूनिवर्सिटी को ये सिस्टम बनाने होंगे:
सपोर्ट हब (सहायता केंद्र): पिछड़े वर्ग के छात्रों को सलाह और पैसों की मदद देने के लिए खास ऑफिस।
इक्विटी समितियां: एक टीम जिसमें SC, ST, OBC और महिलाएं शामिल होंगी। यह टीम भेदभाव की शिकायतों को देखेगी।
इक्विटी स्क्वॉड: छात्र और स्टाफ के सदस्य जो कैंपस में होने वाले गलत व्यवहार पर नज़र रखेंगे।
हेल्पलाइन: 24/7 फोन लाइनें जहां छात्र अपनी समस्या तुरंत बता सकें।
सबके लिए शपथ: कॉलेज जॉइन करते समय हर छात्र और टीचर को एक कागज़ पर साइन करके यह वादा करना होगा कि वे सबके साथ अच्छा व्यवहार करेंगे।
दो अलग-अलग गुट अपनी-अपनी वजहों से नाराज हैं:
1. वे जो सोचते हैं कि नियम बहुत कमज़ोर हैं:
इनका कहना है कि 2012 के पुराने नियम बेहतर थे क्योंकि वे परीक्षा और एडमिशन के दौरान छात्रों की रक्षा करते थे।
उन्हें डर है कि क्योंकि कॉलेज का हेड ही समिति का लीडर होगा, इसलिए कॉलेज के खिलाफ शिकायत होने पर निष्पक्ष फैसला नहीं होगा।
2. वे जो सोचते हैं कि नियम बहुत सख्त हैं:
कुछ छात्रों को डर है कि लोग झूठी शिकायतें कर सकते हैं क्योंकि झूठ बोलने पर कोई सजा नहीं रखी गई है।
उन्हें यह भी लगता है कि इक्विटी समिति में "सामान्य श्रेणी" (General Category) के छात्रों को शामिल न करना गलत है।
सरकार इन नियमों को जल्दी लागू कर रही है क्योंकि पिछले कुछ सालों में कॉलेजों में भेदभाव की शिकायतें दोगुनी से भी ज्यादा बढ़ गई हैं।
UGC ने चेतावनी दी है कि जो कॉलेज ये नियम नहीं मानेंगे, उन्हें कड़ी सजा मिलेगी:
उन्हें सरकार से मिलने वाला फंड (पैसा) बंद कर दिया जाएगा।
उन्हें नए कोर्स या ऑनलाइन डिग्री शुरू करने की अनुमति नहीं मिलेगी।